भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने जनवरी 2026 में हाजिर मुद्रा बाजार से शुद्ध 2.526 अरब अमेरिकी डॉलर की खरीदारी की है। यह जानकारी केंद्रीय बैंक के मासिक बुलेटिन में सोमवार को जारी की गई। लगातार सात महीनों तक डॉलर बेचने के बाद यह पहली शुद्ध खरीदारी है, जो रुपये पर पड़ रहे दबाव को संतुलित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

लगातार बिक्री के बाद खरीदारी का रुख

आरबीआई ने मई 2025 में आखिरी बार 1.764 अरब डॉलर की शुद्ध खरीदारी की थी। उसके बाद जून से दिसंबर 2025 तक सात महीनों में लगातार डॉलर बेचे गए। दिसंबर 2025 में सबसे अधिक 10.02 अरब डॉलर की शुद्ध बिक्री हुई, जबकि नवंबर में 9.710 अरब, अक्तूबर में 11.877 अरब, सितंबर में 7.910 अरब, अगस्त में 7.695 अरब, जुलाई में 2.540 अरब और जून में 3.661 अरब डॉलर बेचे गए थे। जनवरी 2026 में सकल खरीदारी 27.999 अरब डॉलर रही, जबकि बिक्री 25.473 अरब डॉलर थी, जिससे शुद्ध खरीद 2.526 अरब डॉलर बनी। यह बदलाव रुपये को मजबूती देने और विदेशी मुद्रा भंडार को संतुलित रखने की रणनीति का हिस्सा लगता है।

रुपये की हालिया चाल और मजबूती

फरवरी 2026 के शुरुआती सप्ताह में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले मजबूत हुआ। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के प्रवाह और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की घोषणा ने इसमें अहम भूमिका निभाई। इसके बाद रुपया काफी हद तक स्थिर रहा। हालांकि मार्च 2026 (20 मार्च तक) में रुपये पर दोबारा दबाव दिखा, जिससे मुद्रा में गिरावट का रुख बन गया। आरबीआई बाजार में सक्रिय हस्तक्षेप कर रुपये की अस्थिरता को नियंत्रित करने की कोशिश करता रहा है।

वैश्विक अस्थिरता और पश्चिम एशिया संघर्ष का प्रभाव

रुपये पर बढ़ता दबाव मुख्य रूप से पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष से उपजी वैश्विक बाजार अस्थिरता का नतीजा है। इससे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और निवेशकों की सतर्कता बढ़ी, जिसका असर उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ा। आरबीआई रुपये की स्थिरता बनाए रखने के लिए हाजिर बाजार में डॉलर खरीद-बिक्री करता है। जनवरी में खरीदारी का फैसला ऐसे समय आया जब पहले के महीनों में बिक्री से बाजार को संतुलित किया गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने और अत्यधिक अस्थिरता से बचाने में सहायक साबित होगा।

आरबीआई की रणनीति और बाजार हस्तक्षेप

आरबीआई की विदेशी मुद्रा नीति बाजार की गतिशीलता पर निर्भर करती है। जब रुपये पर अत्यधिक दबाव होता है तो डॉलर बेचकर मुद्रा को सहारा दिया जाता है, जबकि मजबूती के संकेत मिलने पर खरीदारी से भंडार बढ़ाया जाता है। 2025 में लगातार बिक्री से रुपये को समर्थन मिला, लेकिन अब खरीदारी से भंडार में सुधार की उम्मीद है। यह हस्तक्षेप न केवल मुद्रा स्थिरता सुनिश्चित करता है बल्कि अर्थव्यवस्था में विश्वास भी बनाए रखता है।

निष्कर्ष: आरबीआई की जनवरी 2026 में शुद्ध डॉलर खरीदारी सात महीने के रुख में बदलाव का संकेत है। यह कदम रुपये की स्थिरता, वैश्विक चुनौतियों से निपटने और विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया है। आगे बाजार की स्थिति और वैश्विक घटनाक्रम इस रणनीति को प्रभावित करेंगे, लेकिन केंद्रीय बैंक की सक्रिय भूमिका अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक रहेगी।

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